जब महात्मा मिल जाऐं उनसे भेद
जब महात्मा मिल जाऐं उनसे भेद लेकर भजन में लग जाओ, गुरू में सच्ची आस्था, सच्चा विश्वास हो जाऐ, सच्चा प्यार हो जाऐ तो तुम साधना मे देखने लगोगे, सुनने लगोगे। अन्तर में चिदाकाश है उसी में चरण कंवल जड़ा हुआ है। उस पर दृष्टि जमाने में वह शीशा बन जाता है। उस दर्पण में वास्तविक रूप दिखाई देता है। इसी को ज्ञानियों ने आत्मदर्शी कहा है। यह छोटा मोटा आनन्द है सन्तमत में, पर ज्ञानियों के लिए यह बहुत बड़ा आनन्द है। सन्तमत में यह शुरूआत है, कोई महिमा नहीं। सन्त तो आपको बहुत कुछ देना चाहते हैं, लेकिन आप लेना ही नहीं चाहते।जब वो नाराज हो जाऐं तो आपको क्या मिलेगा ? सन्तों को नाराज नहीं करना चाहिऐ, उनकी बात माननी चाहिऐ। यही वजह है कि घर घर में रामायण पढ़ा जाता है पर मिलता कुछ भी नहीं। मोहम्मद साहब को सबने नाराज कर दिया। उन्होंने कह दिया कि खड़े हो, उठो बैठो। मिलने वाला कुछ नहीं।पूजा इबादत तो एकान्त का है, शोर शराबे का काम क्या ?
तो सन्तों, पैगम्बरों को कभी नाराज नहीं करना चाहिए। सन्तों के पास तो सब कुछ है ,उनको किसी प्रकार की कोई कमी नहीं पर काल ने आपको बहका दिया और आपकी बुद्धि खराब हो गई। आप रोओगे, चिल्लाओगे, चीखोगे रोटी पानी नही मिलेगा, लोग लूटेंगे, हत्या करेंगे, फूंक फाक कर देंगे तब ये शब्द आपको एक एक करके याद आऐंगे।







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