Monday, 15 July 2013

दिल्ली की गद्दी पर बैठकर कोई भी


 दिल्ली की गद्दी पर बैठकर कोई भी 

दिल्ली की गद्दी पर बैठकर कोई भी माइकालाल भारत की जनता को सुखी नहीं कर सकता। इस भूमि पर सदा ही अत्याचार-अनाचार हुये हैं और यह भूमि का असर है कि लोगों के आचार-विचार ठीक नहीं रह सकते। बुि में विवेक नहीं रह सकता और वह जनता की भलाई का कोई भी काम नहीं कर सकते। इस भूमि में बैठकर सेवा, त्याग, समानता, पे्रम को नहीं पाया जा सकता। इस नगरी में प्रवेश करते ही मनुष्य विचार बदल जाते हैं और वादा कुछ करता है और करता कुछ है। इसमें किसी का दोष नहीं। त्रेता युग में श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को जब कन्धे पर लादकर भारत के तीर्थ स्थानों की यात्रा करा रहे थे तो घूमते-घूमते दिल्ली ;इन्द्रप्रस्थद्ध नगरी में यमुना के किनारे पहुंचे। इनकी सेवा, त्याग, प्रेम, मातृ-पितृ भक्ति का इतिहास है जिसकी चर्चा आज भी लोग किया करते हैं। यमुना के तट पर उन्होंने कांवर को कन्धे से उतारा और उसमें बैठे हुए माता-पिता से बोला कि मैं बहुत थक गया हूं। मेरी हिम्मत नहीं है कि मैं आप लोगों को और आगे ले चलूं। पिता ने पूछा कि बेटा हम लोग कहां पर हैं? श्रवण कुमार ने कहा कि यमुना के किनारे हैं और दिल्ली में प्रवेश कर चुके हैं। पिता ने कहा कि बेटा मेरा इतना कहा और मान लो, और हमें दिल्ली के पार मथुरा के रास्ते पर हमें छोड़ देना। श्रवण कुमार ने सोचा कि अब तक इतनी सेवा जान लगाकर की है तो इस आखिरी बात को क्यों न मान लिया जाए और वे फिर चल पड़। चलते-चलते वो कुछ बोलते जाते थे किन्तु मां-बाप चुप थे। कुछ देर बार चाल में कुछ तेजी आई तो पिता ने पूछा कि बेटा हम लोग अब कहां हैं? श्रवण कुमार ने जवाब दिया कि दिल्ली को पार करके मथुरा की ओर चल रहे हैं। पिता ने कहा बेटा अब तुम हम लोगों को यही छोड़ दो। बेटे ने विनीत भाव से जवाब दिया कि पिताजी मुझे जरा भी थकावट नहीं है और मथुरा पहुंचकर ही विश्राम करूंगा। मां-बाप ने सोचा कि अरे दिल्ली की भूमि का यह असर जिसने हमारे आदर्श बेटे के विचारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर दिया। फिर उन लोगों का क्या हाल होगा जो दिन-रात रहते हैं। बाबा जयगुरूदेव ने आगे कहा कि अब आप लोग सोच लो।

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