UJJAIN:-BABA JAIGURUDEV MANDIR आगे आप की मर्जी है।

बाबा जी का कहना हैं ,शाकाहारी रहना हैं। तन मन करता कौन ख़राब ! अंडा,मछली,मांस,शराब। क्या खाने से होगी भलाई ! साग,सब्जी,दूध,मलाई। कुदरत हैं तैयार खड़ी ! आगे तबाही बड़ी-बड़ी। बाबा जी की अर्जी हैं ! आगे आप की मर्जी है।

BABA JI KA KAHNA HAI SHAKAHARI RAHNA HAI

बाबा जी का कहना हैं ,शाकाहारी रहना हैं। तन मन करता कौन ख़राब ! अंडा,मछली,मांस,शराब। क्या खाने से होगी भलाई ! साग,सब्जी,दूध,मलाई। कुदरत हैं तैयार खड़ी ! आगे तबाही बड़ी-बड़ी। बाबा जी की अर्जी हैं ! आगे आप की मर्जी है। .

SATSANG IN UJJAIN

बाबा जी का कहना हैं ,शाकाहारी रहना हैं। तन मन करता कौन ख़राब ! अंडा,मछली,मांस,शराब। क्या खाने से होगी भलाई ! साग,सब्जी,दूध,मलाई। कुदरत हैं तैयार खड़ी ! आगे तबाही बड़ी-बड़ी। बाबा जी की अर्जी हैं ! आगे आप की मर्जी है। .

SWAMI JI MAHARAJ (BABA JAIGURUDEV)

बाबा जी का कहना हैं ,शाकाहारी रहना हैं। तन मन करता कौन ख़राब ! अंडा,मछली,मांस,शराब। क्या खाने से होगी भलाई ! साग,सब्जी,दूध,मलाई। कुदरत हैं तैयार खड़ी ! आगे तबाही बड़ी-बड़ी। बाबा जी की अर्जी हैं ! आगे आप की मर्जी है। .

SHAKAHARI BANO OR BANAO

बाबा जी का कहना हैं ,शाकाहारी रहना हैं। तन मन करता कौन ख़राब ! अंडा,मछली,मांस,शराब। क्या खाने से होगी भलाई ! साग,सब्जी,दूध,मलाई। कुदरत हैं तैयार खड़ी ! आगे तबाही बड़ी-बड़ी। बाबा जी की अर्जी हैं ! आगे आप की मर्जी है। .

Thursday, 12 June 2014

 बाबा जी का कहना हैं ,शाकाहारी रहना हैं। तन मन करता कौन ख़राब ! अंडा,मछली,मांस,शराब। क्या खाने से होगी भलाई !  साग,सब्जी,दूध,मलाई। कुदरत हैं तैयार खड़ी ! आगे तबाही बड़ी-बड़ी। बाबा जी की अर्जी हैं ! आगे आप की मर्जी है।
Tan-Man Karta Kaun Kharaab,
Anda, Machhli, Maans, Sharab...

Kya Khaane Se Hogi Bhalaai,
Saag, Sabji, Doodh-Malai...

Kudrat Hai Taiyaar Khadi,
Aage Tabaahi Badi-Badi...

Babji Ki Arji Hai,
Aage Aap Ki Marzi Hai...

Baba Ji Ka Kehna Hai,
SHAKAHARI Rehna Hai...

Monday, 15 July 2013

बाबा जी एक रोशनी देते हैं


बाबा जी एक रोशनी देते हैं

जेल में मैं कुछ नहीं बोलता था तो लोग कहते थे कि ये कुछ नहीं बोलते। मैं निरक्षर भट्टाचार्य जब लोगों ने पूछा तो कुछ बता दिया। जानता बूझता तो कुछ नहीं पर सत्य अपनी जगह पर है। बाबा जी एक रोशनी देते हैं। भौतिक वस्तुओं से प्रेम करके आध्यात्मिकता में घटा लीजिए। देश के अधिकारी यह समझें कि ये हमारे बच्चे हैं। बच्चे गलती करें तो दो-चार तमाचे लगा देना तो ठीक है लेकिन उनके साथ दुव्र्यवहार किया जाऐगा और बच्चों को माता पिता का प्यार नहीं मिलेगा तब क्या होगा ? इसे समझने की कोशिश कीजिए। जब कोई झूठ, चोरी या और कोई अन्य खराब काम नहीं छोड़ता है तो अच्छे काम करने में क्या डर ? और आज इसी बात की जरूरत है देश में। मैंने किसी की कोई बुराई नहीं की अगर की हो तो आप बताईऐ। वैसे मैं किसी की बुराई नहीं करता हूं लेकिन यह जरूर कहता हूं कि जो कपड़ा आपका गन्दा हो गया है उसे आप धुलवा लीजिऐ। मुझे धोबी कहते हैं यह आपकी बुद्धि का दिवालियापन है। मैं आपकी दृष्टि, आपके अन्तःकरण, आपकी भावनाओं और आपकी आत्मा की सफाई करता हूं। मैं कपड़ा धोने वाला धोबी नहीं हूं। आप सब लोग बड़ी सावधानी से रहें। देश हित में लगे रहें, समाजहित में लगे रहें किसी को छेड़छाड़ करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर राज्य प्रजातंत्रवादी है तो देश का सारा काम ठीक होना चाहिऐ, सारी व्यवस्था ठीक होनी चाहिऐ। घबड़ाने की बात नहीं है बाबा जी का आपके साथ पूरा सद्भावना है। जनता ने सेवा करने का एक मौका दिया है उसकी इच्छा को पूरा होने दीजिऐ। मैं अनुरोध करूंगा आपसे किसी की कुछ बातें हों उसे आप सुनिए,लेकिन जितनी जरूरी चीजें हों उतना ही आप इनके सामने रखें, ऐसी बातें चुन लीजिऐ ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है।(शाकाहारी पत्रिका: 14 नवम्बर 1980)

सभी सत्संगी विशेष ध्यान दें


सभी सत्संगी विशेष ध्यान दें

सभी सत्संगी जो सन्त मत की साधना में लगे हैं जानना चाहिऐ कि संतमत के क्या-क्या नियम हैं। उन नियमों को मानने की इसलिए
जरूरत पड़ती है कि जिस समाज में हम लोग रहते हैं ओर काम करते हैं उसकी पूरी जानकारी और पूरा ज्ञान हमको हो जाऐ ताकि हम फंसे नहीं। ज्ञानशून्य होने पर तुम फंस जाओगे। सन्तमत में जो प्रेमी साधना करते है वे सन्तमत के नियमों को भली प्रकार से पका लेते हैं, समझ लेते हैं, बुद्धि में जमाऐ रहते हैं ताकि साधन में विध्न बाधा न पड़े, फंसे नहीं और साधन-भजन न छूटे। इसलिए नियमों को जानने की जरूरत है साधक साधना में चलते रहते हैं, समझते रहते हैं नहीं तो साधना शून्य सी रहती है और कुछ देखा नहीं। इतने दिन सत्संग सुनते हो गऐ हर विषय पर, हर भावनाओं का और हर कामों का ऊंचा-नीचा सबकुछ सत्संग में सुनने को मिला। सत्संग को इतनी समझदारी से पीना चाहिए ताकि अजीर्ण न हो। पी ला, घोट लो और पचाओ। सन्तमत की साधना, उपासना भावभक्ति सेवा और प्रेम सब समझ आ जाऐगा। सुरत शब्द की बात भी समझ में आऐगी। जो नहीं समझते हैं वह अधकचरे रह जाते हैं। इसलिए सत्संग की जरूरत पड़ती है ताकि घोर अज्ञानता से निकालकर सीधे साधना में लग सके।

दूसरी बात यह कि सतपुरूष ऐसे दया नहीं करगें और न उनके नीचे के लाकों के ब्रम्ह, पारब्रम्ह और निरंजन ही ऐसे दया करेंगे। ऐसा सिलसिला और वसीला बना है कि जो उधर से आऐ, इधर से जाऐ और वह उनसे मिला है वही दया दे सकता है। जो नहीं मिला है वह दया नहीं दे सकता हैं। सन्त आते हैं तब सतपुरूष की दया होती है वैसे नहीं। इसलिए तो गुरू के लिए जोर दिया गया है। उसके आगे सबने कलम बन्द कर दी।(शाकाहारी पत्रिका: 7 दिसम्बर 1980)

बाबा जयगुरूदेव की अपील मानवमात्र इन्सानों से


बाबा जयगुरूदेव की अपील मानवमात्र इन्सानों से



वर्तमान राजनीतिक आलोचना देरूा व जनता के लिए घातक। शासक आदमी है फरिश्ते नहीं। बाबा जयगुरूदेव ने कहा कि वर्तमान शासक आदमियों को दिल्ली में काम करने दें, आलोचना न करें क्योंकि आलोचना से काम करने वालों का मस्तक ऊक-चूक हो जाता है। जब मस्तक बिगड़ गया तो कोई काम सही नहीं होता है। सही काम भी गलत दिखाई देता है।

बाबा जयगुरूदेव ने कहा कि मुझे तो सम्पूर्ण देश की जनता के हितों को देखना है न कि प्रधानमन्त्री। जहां प्रधानमन्त्री सम्पुर्ण देश। बाबा जयगुरूदेव ने देशभक्तांे से अपील की कि देश भक्त जनता के हितों को देखें न कि कुर्सी को और किसी की आलोचना न करें। आलोचना से देशभक्तों की शक्ति क्षिण होती है और मानवता की गरिमा जाती रहती है, वाणी में अशुद्धता आती है, जनता में अविश्वास आता है। देश में जो नाजुक दौर-दौरा जनता के दुःखों का चल रहा है इसमें बहुत संख्या में किसान पीड़ित हैं। यह रोग मलेरिया और इनफलूएन्जा का फैल गया है। ऐसा अनुमान होता है कि थौड़े दिनों में टाइफाइड की शक्ल ले लेगा। इसका सही उपचार नहीं किया गया तो अन्त में सन्नीपात हो जाऐगा। ऐसी अवस्था में अनुभवी वैद्य की जरूरत है। रोगी को वैद्य की जरूरत पड़ेगी, न्याय के लिए न्यायाधीश चाहिऐ, पत्नी को पति की जरूरत पड़ेगी, विद्यार्थी को अध्यापक जरूर चाहिऐ, प्रजा बिन राजा के नहीं रह सकती है, राजा को सलाह के लिए राजगुरू अवश्य चाहिऐ। मन्त्री राजगुरू का काम नहीं कर सकता। राजगुरू जनता की कुंजी है। राजगुरू राजा को सलाह नहीं दे सकते फिर योगियों की जरूरत पड़ेगी।

बाबा जयगुरूदेव जी ने फिर जोरदार शब्दों में अपील की कि जनता जनार्दन के हितों के लिए वर्तमान शासक या आने जाने वाले शासक इन सबकी आलोचनाओं का आदान-प्रदान बन्द कर दें। वास्तव में अगर जनता का हित चाहतें हैं तो जनता व देश हित के लिए सरकार को सलाह दें। हमारी सलाह और सहयोग से सरकार कुछ नहीं कर पाती तो आगे भगवान कर्ताधर्ता है, कुछ ईश्वर पर भी विश्वास करो। मनुष्य का कर्तव्य यह है कि ईमानदारी व मेहनत के साथ दुकान-दफतर का काम करें, शाम को बच्चों की सेवा। आधा-पौना घण्टा भगवान का भजन करें। मुसलमान खुदा की इबादत करें, ईसाई गाॅड की प्रार्थना करें सारी समस्याऐं सुलझती दिखाई देंगी। बाबा जयगुरूदेव तो आपके सामने हैं।(27 दिसम्बर 1980)

एक अपील, एक अनुरोध जनता से

एक अपील, एक अनुरोध जनता से


मैं प्रार्थना करता हूं देवताओं से कि सबको सद्बुद्धि दीजिऐ। कुदरत की लीला का आपको कुछ कुछ भान होने लगा है। भारत की जनता से
अनुरोध करता हूं कि अस्सी फीसदी जनता सत्युग िढ़ंढ़ोरे का मौका दे दे और सहयोग दे। अपने खेत की तरफ ध्यान रखें। मैं इधर से उधर से, देवताओं से, अग्नि, वायु और आकाश और आप से भी काम चाहता हूं। सावधानी के साथ भारत की जनता की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। देश के जिम्मेदार प्रतिनिधियों से भी हमारा अनुरोध है कि हमारा सहयोग दें हम आपका काम करेंगे। हमारी मदद कीजिऐ। हमारी और आपकी मदद से काम हो जाऐगा। आप भी चाहते हैं आराम मिले। हम भी चाहते हैं कि सबको आराम मिले। जब सबकी आकांक्षा एक है तो हम सबको एक नई सड़क बनाकर चलना और चलाना हैं। मानेंगे तो ठीक, नहीं मानते तो आप जानें और आप का काम जानें। सतयुग आऐगा इसको कोई रोक नहीं सकता।(शाकाहारी पत्रिका: 14 मार्च 1981)

बाबा जी का पैगाम


बाबा जी का पैगाम




इन माताओं के गर्भ से कुछ ऐसे बच्चों का अवतार हो गया है जो आपको सीधा करेंगे, दिल्ली वालों को भी सीधा करेंगे। वो बच्चे इन माताओं के गर्भ से आ गऐ और उसका ज्ञान आपको थोड़े दिनों में होने वाला है। उनका संकेत हर प्रांतों में हम कर देंगे। हमारी आवाज के साथ हमारी पत्रिका बनेगी और जहां तक ये हवा जाऐगी वहां तक यह पत्रिका जाऐगी और वह हवा आपमें प्रवेश कर जाऐगी। सब जगह घूम घूमकर यह हवा हम पहुँचा देंगे। औतारी शक्तियों का एक पूरा समाज एक पूरी नाट्यशाला उतरी हुई है जो यहां काम करेगी। यह संकेत हम पहले से ही आपको दे रहे हैं। वक्त का इन्तजार तो करना ही पड़ता है।(1967)

भारत कर्मभूमि है



भारत कर्मभूमि है

कृष्ण ने कहा था कि भारत कर्मभूमि है। यहां आघ्यात्मवाद रहेगा, मानववाद रहेगा, भौतिकवाद नहीं चलेगा। इसे भोगभूमि मत बनाओ नहीं तो विनाश हो जाऐगा। इस भूमि से धर्म को कभी खत्म नहीं किया
जा सकता। धर्म को खत्म करने वाले स्वयं खत्म हो जाऐंगे। समय थौड़ा रह गया है। किसी महापुरूष की छत्रछाया में रहोगे तो अकाल मृत्यु से बच जाओगे। कलयुग जाने वाला है और सत्युग आने वाला है। दोनो के टकराव में महाभारत होगा फिर विनाश हो जाऐगा। कई सौ साल पहले सूरदास जी ने कहा था कि:


अकाल मृत्यु जगमाही व्यापै, परजा बहुत मरे।
काल ब्याल से वही बचे जो गुरू का ध्यान धरे।।


(शाकाहारी पत्रिकाः 1982)