Monday, 15 July 2013

अपने धर्म उपदेश के साथ-साथ



अपने धर्म उपदेश के साथ-साथ


मैं 4 अप्रैल 1971 को जब कलकत्ते से हवाई जहाज द्वारा रवाना हुआ तो बैंकाक रूका। दूसरे दिन मलेशिया में पेनंाग पहुचा। अपने धर्म उपदेश के साथ-साथ मैंने जो अनुभव किए उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
जा स्त्री चाय के बागानों में काम करती है उसको 6 डालर रोज मिलता है और पुरूष को 12 डालर। प्राइमरी स्कूल के 
अध्यापकों को 300 डालर माहवार मिलता है। पुलिस का सिपाही जब भर्ती होता है उसी दिन से उसको 270 डालर माहवार मिलता है। सब सिपाहियों को 6 वर्दी, 3 टोपी, दो जोड़ी जूता एक साल में मिलता है। मोटर सायकिल फ्री। पानी, बिजली, मकान सब फ्री। हर सिपाही के पास रिवालवर है।
मलेशिया का एक डालर भारत के 7 रूपये के बराबर है। कोई भी मजदूर चाहे वह स्त्री हो, पुरूष हो, चपरासी हो, सिपाही हो, अद्यापक हो या स्वीपर हो सबको कम से कम एक हजार रूपये से अधिक वेतन मिलता है।हर चीज बहुत सस्ती है और मजदूरी बहुत है। भारत में मजदूरी कम और महगाई अधिक से अधिक है। इसलिए भारत सदा गरीब रहेगा। आखिर वह भी तो मुल्क है, वहा भी तो इंसान रहते हंै। वहा की सम्पन्नता 10 वर्ष की तरक्की का नमूना है।
मैंने वहा के आदमियों से पूछा कि आपके देश में इतनी उन्नती क्यों है ? उन्होंने जवाब दिया कि हममें देश भक्ति है, हम समय की कीमत जानते हैं और किसी का समय नष्ट नहीं करते। हम अपने और देश के लिए काम करते हैं। भारत के पिछड़ेपन के बारे में जब पूछा तो वे बोले कि (1) भारत के लोगों में देश भक्ति नहीं है। (2) भारत के लोग ऊपर से नीचे तक सब चोर हैं। (3) भारत के हुकूमत करने वाले लोग जनता को खुशहाल नहीं होने देना चाहते हैं। (4) भारत के लोग मन में सोचते कुछ हैं, कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। (5) वहा के लोगो का इतना पैसा यहा के बैंको में जमा है जिसका कोई हिसाब नहीं। 1971

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